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क्या मनीष सिसोदिया के घर में रेड पड़ना एक राजनीति है? By वनिता कासनियां पंजाब फॉलो कर रहे हैंराजनीति पर नजर बनी रहती है...25 मिनट ✍️ सवाल पर चर्चा से पहले कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों को समझें।किसी समय लालू प्रसाद यादव की बिहार और केन्द्र में तूती बोलती थी।लालू ने एक बार गुजरात जाकर एक रैली में अपने अंदाज में नरेंद्र मोदी को ललकारा था और कहा था कि वो उनका वध करने आए हैं।पर इसके कुछ समय बाद लालू प्रसाद यादव जैसा घाग राजनेता बिहार की राजनीति में अपना रुतबा खो देता है।जिसका फायदा नीतीश कुमार को होता हैं। क्योंकि वो बीजेपी के साथ आ जाते हैं।नहीं तो नीतीश के सामने लालू बिहार में कहीं ज्यादा प्रभावशाली नेता थे।पर मोदी अंध विरोध में लालू ने अपनी प्रसंगता खो दी थी।गुजरात दंगों के बाद कांग्रेस की अगवानी में पूरे विपक्ष ने नरेंद्र मोदी को घेर लिया था।तो सोनिया गांधी ने उस समय, नरेंद्र मोदी को मौत का सौदागर कहा था।राहुल गांधी का विरोध भी कभी बीजेपी से नहीं, सीधा नरेंद्र मोदी से रहा है।पर आज कांग्रेस क्षेत्रीय पार्टियों से भी कमजोर हो चुकी है और सोनिया गांधी और उनके पुत्र राहुल गांधी, खुद ईडी के चक्कर काट रहे हैं।भारतीय राजनीति में ऐसे और भी बहुत सारे उदाहरण मिल जाएंगे।सवाल पर लौटते हैं।क्या मनीष सिसोदिया के घर में रेड पड़ना एक राजनीति है?तो इसकी पुष्टभूमि में है, अग्निवीर योजना के समय किया गया हुड़दंग।जिसमे ट्रेनें और बसों को आग लगाई गई थी, जिसमे लोगों के साथ, विपक्ष के कार्यकर्ता और विपक्ष का समर्थन भी शामिल था।नहीं तो ऐसे अंतकवादियों जैसे कार्य कभी भी आम जनता नहीं करती।नूपुर विरोध, जिसमे भारत सरकार को विदेशी सरकारों के आगे झुकना पड़ा था।यहां भी बेसमझ विपक्ष, नूपुर के विरोध में था।मात्र एक बयान से देश का माहौल खराब करने और देश की संपति जलानेवालों का समर्थन करना, एक देश विरोधी कार्य होता है।पर सबसे ज्यादा जिम्मेदार है, किसान आंदोलन।जो शुरू तो हुआ, कृषि बिलों के विरोध में। पर बाद में राजनीतिक हो गया।वहीं किसान आंदोलन जिसके सामने एक चुनी हुई सरकार को ब्लैकमेल का शिकार होकर झुकना पड़ा था।कारण उस आंदोलन को आम आदमी पार्टी, लेफ्ट, अन्य विपक्ष, पाकिस्तान, कनाडा, यूएसए और ब्रिटेन के खालिस्तान समर्थक एनआरआई का कट्टर समर्थन प्राप्त था।26 जनवरी को खालिस्तानी झंडे लहराने के पीछे एक बड़ी साजिश हो सकती थी, जिस से दिल्ली में हिंदू सिखों को लड़वाना और माहौल खराब करना उद्देश्य हो सकता था।पर किसान आंदोलन को लीड करने वालों में कुछ ऐसे समझदार किसान नेता भी थे, जिन्होंने इस साजिश को पहले ही समझ लिया और शांति बनाए रखी और साजिश को सफल नहीं होने दिया।केंद्र ने इस सितिथी को बेहद समझदारी से संभाला और पुलिस को आक्रामक नहीं होने दिया था।अब जो जो लोग इन सारे कार्यों में साजिश में शामिल थे। अब उन सबको सरकार छोड़ने वाली नहीं है।अब जांच एजेंसियों का काम क्या होता है, भ्रष्टाचारियों और अपराधियों की धड़ पकड़।अब भारत में राजनीतिक पार्टियों में भ्रष्टाचार तो खूब पाया जाता है।अब उपर से लोक सभा चुनाव में भी ज्यादा समय नहीं है।तो मोदी सरकार 2024 में भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे को लेकर ही जनता में जाने वाली है।यह ऐसा मुद्दा है, जिनको गरीब और मध्य वर्ग का सबसे ज्यादा समर्थन मिलता है और चुनाव में वोटिंग भी यही करता है।अब आज दिल्ली का नंबर है तो आने वाले दिनों में महाराष्ट्र, यूपी, बिहार, बंगाल और अन्य राज्यों में भी अब यही होने वाला है।जो ईमानदार हुआ वो रेड के बाद भी बच जाएगा। नहीं तो सीबीआई और ईडी, अब किसी को भी छोड़ने वाली नहीं है।बहुत बहुत धन्यवाद। 🙏🙏चित्र स्रोत:गूगल इमेजेस के द्वारा आभार सहित।


✍️ सवाल पर चर्चा से पहले कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों को समझें।

किसी समय लालू प्रसाद यादव की बिहार और केन्द्र में तूती बोलती थी।

लालू ने एक बार गुजरात जाकर एक रैली में अपने अंदाज में नरेंद्र मोदी को ललकारा था और कहा था कि वो उनका वध करने आए हैं।

पर इसके कुछ समय बाद लालू प्रसाद यादव जैसा घाग राजनेता बिहार की राजनीति में अपना रुतबा खो देता है।

जिसका फायदा नीतीश कुमार को होता हैं। क्योंकि वो बीजेपी के साथ आ जाते हैं।

नहीं तो नीतीश के सामने लालू बिहार में कहीं ज्यादा प्रभावशाली नेता थे।

पर मोदी अंध विरोध में लालू ने अपनी प्रसंगता खो दी थी।


गुजरात दंगों के बाद कांग्रेस की अगवानी में पूरे विपक्ष ने नरेंद्र मोदी को घेर लिया था।

तो सोनिया गांधी ने उस समय, नरेंद्र मोदी को मौत का सौदागर कहा था।

राहुल गांधी का विरोध भी कभी बीजेपी से नहीं, सीधा नरेंद्र मोदी से रहा है।

पर आज कांग्रेस क्षेत्रीय पार्टियों से भी कमजोर हो चुकी है और सोनिया गांधी और उनके पुत्र राहुल गांधी, खुद ईडी के चक्कर काट रहे हैं।

भारतीय राजनीति में ऐसे और भी बहुत सारे उदाहरण मिल जाएंगे।


सवाल पर लौटते हैं।

क्या मनीष सिसोदिया के घर में रेड पड़ना एक राजनीति है?

तो इसकी पुष्टभूमि में है, अग्निवीर योजना के समय किया गया हुड़दंग।

जिसमे ट्रेनें और बसों को आग लगाई गई थी, जिसमे लोगों के साथ, विपक्ष के कार्यकर्ता और विपक्ष का समर्थन भी शामिल था।

नहीं तो ऐसे अंतकवादियों जैसे कार्य कभी भी आम जनता नहीं करती।


नूपुर विरोध, जिसमे भारत सरकार को विदेशी सरकारों के आगे झुकना पड़ा था।

यहां भी बेसमझ विपक्ष, नूपुर के विरोध में था।

मात्र एक बयान से देश का माहौल खराब करने और देश की संपति जलानेवालों का समर्थन करना, एक देश विरोधी कार्य होता है।


पर सबसे ज्यादा जिम्मेदार है, किसान आंदोलन।

जो शुरू तो हुआ, कृषि बिलों के विरोध में। पर बाद में राजनीतिक हो गया।

वहीं किसान आंदोलन जिसके सामने एक चुनी हुई सरकार को ब्लैकमेल का शिकार होकर झुकना पड़ा था।

कारण उस आंदोलन को आम आदमी पार्टी, लेफ्ट, अन्य विपक्ष, पाकिस्तान, कनाडा, यूएसए और ब्रिटेन के खालिस्तान समर्थक एनआरआई का कट्टर समर्थन प्राप्त था।

26 जनवरी को खालिस्तानी झंडे लहराने के पीछे एक बड़ी साजिश हो सकती थी, जिस से दिल्ली में हिंदू सिखों को लड़वाना और माहौल खराब करना उद्देश्य हो सकता था।

पर किसान आंदोलन को लीड करने वालों में कुछ ऐसे समझदार किसान नेता भी थे, जिन्होंने इस साजिश को पहले ही समझ लिया और शांति बनाए रखी और साजिश को सफल नहीं होने दिया।

केंद्र ने इस सितिथी को बेहद समझदारी से संभाला और पुलिस को आक्रामक नहीं होने दिया था।

अब जो जो लोग इन सारे कार्यों में साजिश में शामिल थे। अब उन सबको सरकार छोड़ने वाली नहीं है।

अब जांच एजेंसियों का काम क्या होता है, भ्रष्टाचारियों और अपराधियों की धड़ पकड़।

अब भारत में राजनीतिक पार्टियों में भ्रष्टाचार तो खूब पाया जाता है।

अब उपर से लोक सभा चुनाव में भी ज्यादा समय नहीं है।

तो मोदी सरकार 2024 में भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे को लेकर ही जनता में जाने वाली है।

यह ऐसा मुद्दा है, जिनको गरीब और मध्य वर्ग का सबसे ज्यादा समर्थन मिलता है और चुनाव में वोटिंग भी यही करता है।

अब आज दिल्ली का नंबर है तो आने वाले दिनों में महाराष्ट्र, यूपी, बिहार, बंगाल और अन्य राज्यों में भी अब यही होने वाला है।

जो ईमानदार हुआ वो रेड के बाद भी बच जाएगा। नहीं तो सीबीआई और ईडी, अब किसी को भी छोड़ने वाली नहीं है।


बहुत बहुत धन्यवाद। 🙏🙏


चित्र स्रोत:

गूगल इमेजेस के द्वारा आभार सहित।

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